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मीडिया ट्रायल के शिकार डा. कुमार सुमन सिंह उर्फ रंजीत डॉन की “अन्टोल्ड स्टोरी”

सीबीएसई पी.एम.टी. परीक्षा पेपर लीक कांड के आरोपी रंजीत डॉन के नाम से पूरा देश वाकिफ हैं। लेकिन डा. कुमार सुमन सिंह उर्फ डा. रंजीत को सामने देखकर पहचान करने वाले उन्हें नाम से जानने वालों की तुलना में पाँच फीसदी से भी कम है। इसके पीछे की वजह डा. रंजीत की मीडिया से बनाई गई दूरी भी है।

इसी तरह 2004 में बेगूसराय से निर्दलीय लोकसभा चुनाव लड़ चुके डा. रंजीत के व्यक्तित्व से भी कम लोग अवगत है। दिलचस्प बात यह है कि साइंस के विद्यार्थी रहे डा. रंजीत के ड्राइंग रुम में साहित्यिक किताबों की भरमार है। दार्शनिक अंदाज में वे मानव सभ्यता के विस्तार और आवागमन पर बातचीत करते हुए मैक्समूलर से लेकर महात्मा गाँधी के उद्धरणों को स्मरण देते हुए डा. रंजीत कहते हैं “मेरा मिजाज लेखक का हैं लेकिन मीडिया ने मुझे डॉन बना दिया”। आगे कहते हैं कि मैं तो सामाजिक न्याय का आदमी हूँ। नीतीश कुमार के साथ राजनीतिक गतिविधियों में 1990 से ही जुड़ा रहा। श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में समता पार्टी की स्थापना में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और उसके बाद 1996 की बिहार नवनिर्माण रैली में डेढ़ सौ से अधिक गाड़ियों की व्यवस्था कर रैली की सफलता सुनिश्चित किया था। साल 1998 में नालंदा से चुनाव प्रबंधन के दौरान  जार्ज फर्नांडिस के सम्पर्क में आने के बाद लंबे समय तक के लिए उनके सानिध्य में रहा। जार्ज साहब से गहरा रिश्ता रहा।

अपनी राजनीतिक गतिविधियों को बताते हुए कहते है कि साल 2002 से हमें लगने लगा कि जार्ज साहब से लोगों का कम्युनिकेशन गैप होने लगा तब साल 2003 में मगध विकास मोर्चा के बैनर तलें नालंदा के सभी 18 प्रखंडों में स्थानीय मुद्दों को लेकर बैठक कर रहे थे। बैठकों में भारी भीड़ उमड़ रही थी। स्थानीय नेताओं को मेरी मजबूत उपस्थिति से खतरा महसूस होने लगा। नतीजतन मगध विकास मोर्चा को माफिया विकास मोर्चा कहकर मेरे विरुद्ध साजिश रची जाने लगी। नीतीश कुमार के कान भरने में नालंदा के एक विधायक ने कोई कसर नहीं बाक़ी रखीं कि मैं सांसद बनने की तैयारी कर रहा हूँ। इसके बाद स्थितियां मेरे विपरीत शुरू होने लगी।

सीबीएसई पीएमटी परीक्षा प्रश्न पत्र लीक को लेकर पटना में पड़े छापे के बाद सीबीआई द्वारा बिना वजह के उन्हें ट्रांजिट रिमांड पर लिया गया। जबकि इस केस में अभियुक्त बैंक मैनेजर अजय कुमार सिंह के द्वारा 164 के तहत दर्ज कराये गये बयान में मेरा नाम तक नहीं लिया गया है। बल्कि राजीव झा उर्फ़ बउवा झा और शिवनंदन सिंह का नाम लिया गया था। यहाँ एक बार भी मेरा नाम नहीं लिया गया है। अब लगभग पाँच साल से अधिक समय जेल में काटने के बाद अब अदालत से जल्द ही सुनवाई पूरी करने की उम्मीद कर रहा हूँ।

मेरे उपर चल रहा मामला संभवतः देश का पहला ऐसा केस है जिसमें आरोपी ने छ: बार स्पीडी ट्रायल करने की गुजारिश की हो। अदालत ने भी बार-बार निश्चित अवधि में मुकदमे की सुनवाई करने की बात कही किन्तु समय दर समय गवाह बढ़ते जा रहे है अब तक 125  गवाहों की गवाही के बावजूद मेरे उपर कोई भी आरोप साबित नहीं हुआ है। लेकिन अदालती पेंच ने मेरे व्यक्तिगत छवि पर ग्रहण जरूर लगा दिया है।

वे राजनीतिक वजहों से खुद को फंसायें जाने की बाते कहते हुए बताते है कि नीतीश कुमार से अलगाव के बाद भी 2004 में नालंदा लोकसभा से निर्दलीय चुनाव लड़ने की जगह बेगूसराय से चुनाव लड़ने का रास्ता चुना क्योंकि मुझे सामाजिक दायित्वों का भी निर्वहन करना था। समाज को राजनीतिक नुकसान नहीं पहुंचे इसका भी ख्याल रखना था।

विदित हो कि डॉ. रंजीत की पत्नी दीपिका कुमारी भी 2015 के विधानसभा चुनाव में लोजपा के टिकट पर हिलसा विधानसभा से चुनाव लड़ चुकी है। गत चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले महागठबंधन प्रत्याशी के तौर पर उतरे राजद के अत्रिमुनि सिंह उर्फ़ शक्ति यादव को कड़ी टक्कर मिली थी। स्वयं डॉ. रंजीत ने भी एमएलसी चुनाव में एनडीए प्रत्याशी के तौर साल 2015 में नालंदा स्थानीय निर्वाचन क्षेत्र से किस्मत आजमाया था, लेकिन यहाँ भी उन्हें कड़े मुकाबले में पराजय का सामना करना पड़ा था।

साहित्यिक किताबों में रुचि रखने  वाले डा. रंजीत बातचीत में मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं के व्यथित पात्रों से लेकर मैत्रेयी पुष्पा की रचनाओं के संघर्षशील विजेताओं की चर्चा करते हैं। अभिमन्यु शर्मा से लेकर शिवाजी सावंत के रचनाओं के अलावे  मराठी साहित्य और हिंदी साहित्य का निरंतर अध्ययन कर रहे है। मराठा साम्राज्य से लेकर औरंगजेब से जुड़े तथ्यों को उभारते है। किताबों से लगाव को बताते हुए कहते है कि जेल के दौरान भी किताबों के अध्ययन में ही समय काटता था। राबर्ट पेन की ‘कत्लगाह’ डोमिनिक लीपियर और  लैरी कालिंग्स की ‘आधी रात को आजादी’ समेत सैकड़ों किताबें पढ़ने की लत रही है। राजनीतिक भविष्य के सवाल पर डा. रंजीत कहते है कि औरंगजेब से लेकर अंग्रेज तक समयानुसार बदलते रहे है। कब क्या होगा कहना मुश्किल है। जमीनी आधार तो है ही, लोगों का स्नेह भी भरपूर मिलता है। फिलहाल लोजपा में सक्रिय है ।

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