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यह भारत है, सिर्फ नेता ही नहीं, पुलिस भी होती है “मॉब अटैक” की शिकार!

देश भर में “मॉब अटैक” के मामले बढ़ रहे है. क़ानून व्यवस्था पर से भरोसा उठने की स्थिति में लोग क़ानून को ताक पर रख कर हिंसक रूप अपना लेते है. “मॉब अटैक” के मामलों के कारण केद्र सरकार और राज्यों की सरकारों की भी काफी किरकिरी हुई है. ताजा मामला सवर्ण समाज द्वारा भारत बंद के दौरान जाप नेता पप्पू यादव और पूर्व मंत्री श्याम रजक पर हमले का है. ध्यान देने वाली बात है कि पप्पू यादव के को “वाई” कैटेगरी की सुरक्षा प्रदान की गयी है, जबकि श्याम रजक के साथ पुलिस की एस्कोर्ट पार्टी और पुख्ता इंतजाम था. इसके बावजूद भी लोग हमले करने का साहस रखते है.

लेकिन सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा है? जिस पुलिस पर क़ानून का राज स्थापित करने की जबाबदेही हो. वो स्वयं कितना सक्षम है. क्या कमजोर पुलिसिंग की वजह से लोगों में क़ानून का डर ख़त्म हो रहा है? देश में पुलिस सुधारों की स्थिति बेहद दयनीय है. हाल ही में पुलिस सुधार का मामला पूर्व पुलिस पदाधिकारी प्रकाश सिंह द्वारा सुप्रीम कोर्ट में ले जाया गया. अदालत ने तब सरकार को कुछ सुझाव दिए थे. लेकिन दिए गये सुझाव पुलिस को संस्थागत सुधार की तरफ ही अधिक थे.

लेकिन जमीनी स्तर पर पुलिस को सटीक कार्रवाई करने और सक्षम बनाने के लिए कोई पहल नजर नहीं आ रही है. देश में पुलिस का अनुपात मानकों के अनुरूप नहीं है. उतर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और दिल्ली जैसे राज्यों में पुलिस का अनुपात 1100:1 ही है. हालांकि राष्ट्रीय अनुपात 729:1 है, जो की संयुक्त राष्ट्र के मानकों से काफी कम है. जबकि भारत सरकार के मुताबिक देश में 547:1 का अनुपात होना अनिवार्य है.

बीते वर्ष देश भर में पुलिस पर भी हमले के अनेक मामले सामने आये है. चौकाने वाली बात यह है कि आये दिन “मॉब अटैक” की घटनाएं सामने आती रहती है. लेकिन  पुलिस पर हो रहे “मॉब अटैक” पर नियंत्रण की दिशा में कोई पहल नहीं हो रही है? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार पुलिस पर हो रहे हमलों को सहन करने को ही पुलिसिंग मान रही है?

The Hindu में 16 मई को छपी एक खबर के मुताबिक आन्ध्र प्रदेश के गंटूर में रात में भीड़ द्वारा पुलिस स्टेशन पर हमला किया गया. हमले की वजह एक बालिका के साथ छेड़छाड़ के आरोपी पर कार्रवाई करने के लिए दबाव देना था.

The Indian Express  में 17 मई को छपी एक खबर के मुताबिक बिहार के औरंगाबाद में एक ट्रक के चपेट में आने के बाद मोटरसाइकिल सवार की मौत हो जाने के बाद भीड़ बारुण थाने के सामने जमा होकर हमला कर देती है. पुलिस ने हमले के 25 आरोपियों को गिरफ्तार किया.

ये घटनाएं महज संयोग या इक्का-दुक्का नहीं है, बल्कि देश के सभी हिस्सों से ऐसी खबरें आना आम बात है. लेकिन ये स्थिति भयावह है. जब जनता की रक्षा करने वाली पुलिस ही सुरक्षित नहीं है तो फिर भीड़ के इंसाफ पर नियंत्रण कैसे होगा?

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