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कब और कैसे गैरमजरूआ खास भूमि भी रैयती हो सकती है जानिए सुबोध कुमार से

बिहार के अनेक गांव पूरे के पूरे गैरमजरूआ खास भूमि पर बसे हुए हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि वह रैयती न होकर सरकारी है।

क्योंकि अगर ऐसे मामलों में खतियान में गैर मजरुआ खास के अतिरिक्त मकान मय सहन बक़ब्जे फलां लिखा हुआ है तो आज की तारीख में वह जमीन शत प्रतिशत रैयती मानी जाएगी।

बिहार सरकार के राजस्व विभाग में उप सचिव स्तर के पदाधिकारी सुबोध कुमार बताते हैं कि एक ऐसे ही मामले में एक आदमी मेरे पास आए और कहा कि सीओ मेरे मकान की जमीन की नापी नहीं कर रहे हैं। सीओ कह रहे हैं कि सरकारी जमीन पर मकान बना हुआ है। नापी नहीं होगा।”



तब मैंने उस व्यक्ति से खतियान का नकल मांगा तो देखा कि खतियान में संबंधित खेसरा में गैरमजरूआ खास अंकित था लेकिन आगे के कॉलम में  मकान मय सहन बक़ब्जे फलां (उस व्यक्ति के पूर्वज का नाम) अंकित था। इस बाबत सीओ से बात करने पर उनके द्वारा बताया गया कि “तब तो जमीन रैयती हो गई। कर्मचारी का प्रतिवेदन स्पष्ट नहीं था। मकान मय सहन बक़ब्जे फलां कर्मचारी ने नहीं लिखा था। कर्मचारी से स्पष्ट प्रतिवेदन मांग कर नापी करवा देते हैं।”

थोड़ी सी जानकारी के अभाव में उस व्यक्ति को अंचल के न जाने कब तक चक्कर लगाना पड़ता और नापी होता भी या नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता था।

भूमि अधिग्रहण के किसी भी मामले में सिर्फ गैर मजरुआ खास देखते ही उसको सरकारी भूमि घोषित कर दिया जाता है (अगर वो मकान मय सहन बक़ब्जे फलां हो तो भी)।

यह स्थिति उचित नहीं है। लोगों को परेशान करनेवाला मामला है सिर्फ। यह तो स्पष्ट रूप से रैयती है। इसका अधिसूचना सरकारी रूप में प्रकाशित होते ही आदमी बेचैन हो जाता है और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाना शुरू कर देता है। एक व्यक्ति बकाश्त भूमि के मामले में भू-अर्जन कार्यालय के चक्कर लगा रहा है, वहां से उसे DCLR ऑफिस भेज दिया गया। जबकि बकाश्त भूमि के संबंध में राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के संकल्प संख्या 925 दिनांक 11.11.14 में स्पष्ट है कि बकाश्त भूमि रैयती है। उसका मुआवजा उस व्यक्ति को आसानी से मिल जाना चाहिए। लेकिन वो व्यक्ति मुआवजे के लिए दौड़ लगा रहा है। यह हालत तब है जबकि उस व्यक्ति के नाम से लगान रसीद भी कटी हुई है।

आखिर इतना कंफ्यूजन क्यों है?

गैरमजरूआ खास मकान मय सहन बक़ब्जे फलां के  संबंध में कई राजस्व मामले के जानकारों से बात की गई। कुछ लोगों का साफ कहना था कि ऐसी स्थिति में भूमि रैयती है। कुछ लोग भूमि को इस आधार पर सरकारी बता रहे थे कि खतियान में गैरमजरूआ खास लिखा हुआ है।

वस्तुस्थिति यह है कि पहले सारी भूमि तो ब्रिटिश सरकार की ही थी। उसने जमींदार के माध्यम से लोगों को रैयत बनाया हुआ था। रैयत लोग जमीन के मालिक नहीं थे। उन्हें खेती करने के लिए रेंट पर जमीन दी गई थी। अब प्रश्न यह उठता है कि जब सारी भूमि सरकार की ही थी तो रैयत आखिर रहते कहाँ और किस आधार पर रहते?

क्योंकि सारी भूमि “सबै भूमि गोपाल की” तर्ज पर तो सरकारी ही थी, क्योंकि किसी भी रैयत का किसी भी जमीन पर मालिकाना हक तो था नहीं। इसलिए अंग्रेजों को रैयतों को कहीं न कहीं तो बसाना था ही। इसलिए लोग पीढ़ियों से जिस जमीन पर रहते चले आ रहे थे, वैसे लोगों की जमीन को कैडेस्ट्रल सर्वे में गैरमजरूआ खास लिख कर मकान मय सहन बक़ब्जे फलां लिख दिया गया।


यानि खतियान के अनुसार यह स्थिति इस तरह से समझी जा सकती है कि सरकार ने लोगों को रहने के लिए सरकारी जमीन बंदोबस्त कर दी। उस समय ऐसी आवासीय भूमि का लगान भी खतियान में नहीं लिखा गया। क्योंकि, उस समय के हिसाब से सारा जोर कृषियोग्य भूमि के लगान पर था। कैडेस्ट्रल सर्वे के बाद भी लगभग 30 वर्षों तक अंग्रेज रहे और ऐसी आवासीय भूमि पर बसे लोगों को उनके द्वारा न तो कभी हटने को कहा गया न ऐसी भूमि का कोई लगान लिया गया। यानि वैसी भूमि लोगों की ही मान ली गई। फिर कैडेस्ट्रल सर्वे के लगभग 100 साल बाद आज की तारीख में वैसी भूमि के रैयती न मानने का कोई आधार नहीं बनता।

आज़ादी के बाद भी इन आवासीय भू-खंडों (पहले भी ये बेलगानी ही थे) का लगान निर्धारण नहीं हुआ। कुछ लोग जो भूमि संबंधी जानकारी रखते थे, उन्होंने खतियान के Entry के हिसाब से उन आवासीय भू-खंडों  का अपने पक्ष में लगान निर्धारण करवा लिया। वैसे बिहार भूमि सुधार अधिनियम,1950 की धारा 5 के अनुसार वास भूमि का लगान निर्धारण करवाने की कोई जरूरत थी नहीं। इस धारा 5 को नीचे विस्तार से समझाया गया है।

आज़ादी के बाद बिहार भूमि सुधार अधिनियम,1950 लागू हुआ। जमींदारी का उन्मूलन हो गया। जमींदारी RETURN भरा गया (यह बात अलग है कि अब जमींदारी RETURN अपवाद रूप में ही कहीं-कहीं उपलब्ध है)।

अब जमीन का एक तरह से मालिकाना हक रैयतों का ही हो गया। खेती करें या परती छोड़ दें, कोई पूछनेवाला नहीं था। 2010 में गैर-कृषि भूमि संपरिवर्तन अधिनियम के पहले लोगों ने कृषि भूमि का जैसा चाहा, सरकार की अनुमति के बिना वैसा उपयोग किया। अभी अधिनियम बनने के बाद ग्रामीण क्षेत्र में सरकार को कृषि योग्य भूमि की कीमत का 10% संपरिवर्तन शुल्क देकर आवासीय/व्यावसायिक उपयोग किया जा सकता है।

वर्ष 1950 में सारी रैयती भूमि पर स्थाई अधिकार संबंधित रैयतों को सरकार ने दे दिया। वास भूमि के संबंध में बिहार भूमि सुधार अधिनियम,1950 की धारा 5 में उल्लेख है Homesteads of intermediaries to be retained by them as tenants–(1) with effect from the date of vesting all homesteads comprised in an estate or tenure and being in the possession of [an intermediary] on the date of such vesting shall,[subject to the provisions of sections 7A and 7B] be deemed to be settled by the State with such[intermediary] and he shall be entitled to retain possession of the land comprised in such homesteads and to hold it as a tenant under the State free of rent.

मतलब मध्यवर्ती(जमींदार) अपना घर Hold कर सकता है as a tenant under the state free of rent.

तो यही नियम स्वतः बाकी लोगों के वास भूमि पर भी लागू होगी। सभी लोग घर को TENANT के रूप में HOLD करेगा राज्य के अधीन बिना किसी लगान के।

इसमें कहाँ कोई दिक्कत है जो समझने में राजस्व सेवा के अधिकारियों को प्रॉब्लम हो रही है। सब कुछ स्पष्ट तो है।

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