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संविदा नियमितीकरण: सरकार की आँखों में धूल झोंकती नौकरशाही या सीएम की घोषणा ही धोखा है?

15 अगस्त 2018 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सूबे में कार्यरत संविदा कर्मचारियों की सेवा साठ साल और सम्मानजनक वेतन की घोषणा कर पूरे देश में सुर्खियाँ बंटोरी थी. बाद में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की घोषणा को अमलीजामा पहनाने के लिए कैबिनेट में उच्चस्तरीय कमिटी की सिफारिशों पर मुहर भी लगा दिया गया. सरकार के इस फैसले से संविदा पर काम कर रहे लाखों कर्मचारियों में खुशी की लहर दौड़ गई.

प्रदेश भर में नीतीश सरकार की भी खूब वाहवाही हुई. लेकिन इन्हीं तमाम संविदा कर्मियों की तरह सामान्य प्रशासन विभाग अन्तर्गत बिहार प्रशासनिक सुधार मिशन सोसायटी के तहत प्रदेश के विभिन्न सरकारी कार्यालयों में कार्यरत लगभग बीस हजार कार्यपालक सहायकों को निराशा ही हाथ लगी है.




सूबे के हजारों कार्यपालक सहायक सरकार से ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. इनका ठगा हुआ महसूस करना भी वाजिब लगता है. चूंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की घोषणा के छ: माह से अधिक समय ख़त्म होने के बाद बिहार प्रशासनिक सुधार मिशन सोसायटी द्वारा जारी किये गये पत्र को देख कर ऐसा ही लगता है. सोसाइटी के पत्रांक 436 दिनांक 26.02.2019 में विभिन्न विभागों को लिखे गये पत्र में नीतीश कैबिनेट के आदेशों को लागू करने की प्रक्रिया में छुट्टी के प्रस्ताव और सेवा साठ साल किये जाने के संबंध में साफ़-साफ़ आदेश जारी कर दिया गया है. किन्तु कार्यपालक सहायकों को हटाये जाने के संबंध में निर्देश पूरी तरह अस्पष्ट तरीके से लिखा गया है. सोसाइटी ने इस संबंध में लिखा है कि ’’अस्वस्थता अथवा अनुशासनिक आधार पर अथवा सेवा असंतोषजनक होने के कारण योजना अवधि अथवा 60 वर्ष की आयु जो पहले लागू हो, के पूर्व भी नियुक्ति प्राधिकार द्वारा सेवा समाप्त की जा सकती है’’.

जबकि सरकार ने स्पष्ट कर दिया गया था कि संविदा कर्मियों को हटाये जाने की प्रक्रिया सरकारी कर्मियों की तरह ही होगी. हटाये जाने पर कर्मी को अपील करने का अधिकार होगा. लेकिन सोसाइटी के द्वारा इस आदेश को लागू करने के लिए पूरी तरह से दरकिनार किया जाना क्या साबित करता है? यह समझ से परे है.

उसी तरह से कैबिनेट की बैठक में सरकार एक तरफ जहाँ संविदा कर्मियों के मानदेय वृद्धि  सामान्य प्रशासन विभाग के ज्ञापांक-3/एम०-78/2005-का० 2401 दिनांक 16.07.2007 का हवाला देते हुए न्यूनतम पारिश्रमिक देने का निर्णय लेती है. तो दूसरी तरह बिहार प्रशासनिक सुधार मिशन सोसाइटी नीतीश कैबिनेट के आदेश के उलट कार्यपालक सहायकों के मानदेय वृद्धि के मूल आधार को ही बदल देता है. 7 मार्च को बिहार के विभिन्न विभागों को लिखे गये पत्रांक संख्या 488 में सोसाइटी ने कार्यपालक सहायकों को तीन भागों में बाँट दिया है. एक कैटेगरी में वैसे कार्यपालक सहायकों को रखा गया है जिन्होंने अपने सेवा 1 जुलाई 2018 को दो वर्ष कर चुके कर्मियों को टेक होम मानदेय 14658 रुपये, पांच वर्ष पूरे करने वाले कर्मियों को 17458 रुपये देने का निर्देश दिया गया है.

तीसरी कैटेगरी में ऐसे कर्मियों को रखा गया है जो BELTRON  अथवा सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के द्वारा दक्षता परीक्षा को पास कर ले उन्हें 18564 रुपये दिए जाने का निर्देश दिया गया है. ऐसे में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की संविदा नियमितीकरण की बातें बेईमानी लगती है.

कुल मिलकर कहे तो न्यूनतम मजदूरी देने से बचने के लिए सरकारी तंत्र जिस तरीके से पेंच लगाने की भरपूर कोशिश कर रहा है. इसका अन्य उदाहरण मिलना मुश्किल है.

अब कार्यपालक सहायकों के सिस्टम को समझिये

वर्ष 2011 में बिहार के प्रखंड और अंचल कार्यालयों में कंप्यूटर आधारित कार्यों के निष्पादन  करने के लिए बिहार प्रशासनिक सुधार मिशन सोसाइटी के तहत आरटीपीएस सेवा को लागू करने के क्रम में  ‘कार्यपालक सहायक’ के पद का सृजन किया गया. विभिन्न जिलों में जिला पदाधिकारी की अध्यक्षता में चयन कमिटी के द्वारा  विज्ञापन के माध्यम से लिखित परीक्षा के माध्यम से इन्हें चयनित किया गया. फिर सात हजार प्रति माह के मानदेय पर जाति, आवासीय और अन्य प्रकार के प्रमाण पत्रों के ऑनलाइन निष्पादन के काम में लगा दिया गया. बाद में परिणाम अच्छे आने पर अन्य विभागों में भी कार्यपालक सहायकों को नियुक्त किया गया. तब से अब तक बिहार के लगभग प्रत्येक विभागों में कुल तीस हजार से अधिक कार्यपालक सहायक कार्यरत है. उच्चस्तरीय कमिटी ने सरकार को सौपें गये प्रतिवेदन में स्पष्ट किया कि कई जगह कार्यपालक सहायक बेंच क्लर्क का काम कर रहे है.



गौरतलब हो कि इन सबका चयन सरकारी तंत्र द्वारा  नियमित बहाली की तर्ज पर ही लिखित परीक्षा  और टंकण जांच के आधार पर होता है. तब से अब तक विभिन्न चरणों में इनका मानदेय बढ़कर 11345 रुपया हो चुका है. लेकिन कभी भी मानदेय बढ़ोतरी के नाम पर दक्षता परीक्षा नही लिया गया. किन्तु अब जब इन्हें नीतीश कैबिनेट ने सम्मानजनक मानदेय देने की घोषणा की तो विभाग के पदाधिकारियों ने इसमें दक्षता परीक्षा का पेंच लगा दिया है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नीतीश सरकार के अफसर ही नीतीश कुमार की घोषणा को जमीन पर लागू होते हुए देखना नहीं चाहते है.

बिहार कार्यपालक सहायक संघ भोजपुर के अध्यक्ष प्रदीप कुमार कहते है कि संकल्प संख्या 2401 के तहत इस पद का सृजन किया गया था. बिहार कैबिनेट ने इसी के तहत मानदेय वृद्धि करने का आदेश भी दिया है. यदि बीपीएसएम संकल्प संख्या 2401 के तहत कार्यपालक सहायकों के मानदेय भुगतान करने के आदेश का पालन करे तो सम्मानजनक मानदेय भुगतान संभव है जो लगभग 22000 प्रतिमाह होगा. लेकिन यहाँ के अफसर मुख्यमंत्री का आदेश ही नहीं मानते है तो क्या रास्ता है. हम अदालत का रुख करेंगे.

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