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बिखरे बिहारी, आहत बिहारीपन और हम भारत के क्रूर लोग

दुर्गेश कुमार

कभी पूर्वोतर में पिट जाने का दर्द तो कभी महाराष्ट्र-गुजरात  में दुत्कारे जाने का दर्द, इससे भी अलग पलायन को हेय दृष्टि से देखे जाने की औपनिवेशिक प्रवृति का दर्द, बिहार झेल रहा है. अब तो इस दर्द की इंतिहा हो गयी है. देश भर में लगभग चौदह करोड़ लोग एक दुसरे हिस्से में प्रवास करते है. एक व्यक्ति के लिए यह पलायन कोई शर्मनाक नहीं होनी चाहिए.. बल्कि वह तो अपने लिए अवसर तलाशता किसी भी कोने में जाता है. यदि गुजराती संभावनाओं की तलाश में अमेरिका जा सकते है, पंजाबी कनाडा जा सकते है, केरल के लोग अरब मुल्कों में जा सकते है, भारत के सारे राज्यों के लोग संभावनाओं की तलाश में यूरोप जा सकते है, ये सभी सम्मानपूर्वक जीवन जी सकते है तो बिहार के लोगों को अपने लिए अवसर तलाशे के लिए अपने ही देश के अन्य राज्यों में जाने को हिकारत की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए.

 

हाँ, यह शर्म यहाँ के राजनितिक वर्ग, प्रशासनिक वर्ग का है. लेकिन उससे भी बड़ा शर्म उन लोगों के लिए है जिनके शहरों के निर्माण में बिहारियों का योगदान रहा है और विपदा आने पर वे दो जून की रोटी नहीं दे सकें. यह शर्म देश के प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह, संघ जैसे तथाकथिक राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के लिए है जो देश की अस्मिता के धवजवाहक होने का दावा करते है. यह शर्म बिहार के सरकार विपक्ष के लिए है, जो इन बिहारी मजदूरों की दिक्कतों का पता लगाने में अक्षम है.

 

सीधा सवाल है! यदि राजस्थान में, हरियाणा में, दिल्ली में या देश के किसी भी हिस्से में रह रहे मजदूरों को खाने का इंतजाम होता तो वे बिहार के लिए पैदल मार्च क्यों करते? राज्य सरकार ने पर्याप्त रूप में मोनिटरिंग सिस्टम खड़े किये होते तो मजदूरों को यह दिन नहीं देखना पड़ता…! बिहारी जिस प्रकार से देश के अन्य हिस्सों में है, उनके व्यवस्था के लिए कम से कम एक हजार सक्षम लोगों की टीम का गठन करना चाहिए था. जो जहाँ है, वहां पर ही उसे राशन पानी का इंतजाम करना चाहिए था. यदि इस आपदा को बिहार का आपदा विभाग हैंडल नहीं कर पा रहा है तो दोषी पदाधिकारियों को हटा देना चाहिए. यह संभव था.. परिजन की मौत जैसे मामलों के कारण भी कुछ लोग पैदल चल रहे है… रो रही महिलाओं की तस्वीरे दर्दनाक है.. ऐसे मामलों के लिए क्या इंतजाम किये है..यह सवाल तो केंद्र सरकार के बनता है.. कौन पूछेगा?

 

लेकिन यह सब नहीं हुआ.. इसकी जगह राजनीति हुआ.. बिहारियों को वापस लाओ..जैसे हेडलाइंस चुराने वाली राजनीति में यह सवाल गौण हो गया. आम लोगों को लगा की विपक्ष ही सही बोल रहा है. लेकिन इस राजनीति ने बिहार के कलेक्टिव अप्रोच को कभी उभरने ही नहीं दिया.. जिसकी सबसे अधिक जरुरत आज है. यदि सामूहिक शक्ति से बिहार लड़ता तो हम सब मजदूरों की दशा देखकर रोते नहीं… दिमाग से राजनीति के जाले साफ़ कर सोचिये..

 

राज्य सरकार की पालिसी पर रचनात्मक चोट करने की जगह हवा-हवाई बातें हुई.. तो असल बाते कौन उठाएगा..? एक-दो लाख बिहारियों के वापस लौटने के बाद भी परदेस में करोड़ों बिहारी है, रहेंगे. उनके भोजन-पानी-रोजगार पर ‘जम्बो टीम’ बनाने की जरुरत है..यह यदि सरकार को नहीं सूझ रहा है तो विपक्ष का काम क्या है? हम बिहार के तमाम लोगों को भी आवाज उठाना चाहिए की देश के तमाम जिलों में जहाँ कहीं भी बिहारी रहते हो उनके लिए बिहार की तरफ से एक टीम प्रतिनियुक्त हो… ताकि उनकी समस्याओं का समाधान हो सकें. यदि उतर प्रदेश की पुलिस लाठियां मार रही है तो उस पर विरोध दर्ज कराया जाना.. बिहार के भाजपा नेताओं का भी काम है..वे पहले इंसान और बिहारी ही तो है.. भाजपाई तो बाद में है! पुलिस यमुना विहार में  मजदूरों पर लाठियां मार रही है. ये मजदूर उतर प्रदेश-बिहार के ही होंगे.. यह आदेश दे कौन रहा है. इसकी जगह मजदूरों की बस्तियों में यह प्रशासन रोटी-दाल का इंतजाम क्यों नहीं कर रहा है..?

 

बिहार के विपक्ष की भाषा देखिये… बिहार में उद्योग नहीं लगा..एक नेता पहले सुई का कारखाना खोजते थे.. उद्योग-रोजगार पर सवाल पूछने में कैजुअल अप्रोच क्यों.. बिहार में भी कारखाने है..यह पर्याप्त नहीं है. जब तक विपक्ष सही तरीके से तथ्यातमक रूप से सवाल नहीं करेगा… उस पर न तो सरकार जागेगी और न जनता ध्यान देगी.. बिहार का विपक्ष/नेता एक्सपर्ट की तरह सवाल पूछता तो सरकार हिलती भी और जनता भी विपक्ष को गंभीरता से लेती. पूछिये सरकार से स्टार्ट अप फंड देने के लिए निर्धारित लक्ष्य क्यों नहीं पूरा हो रहा है.. पूछिये सरकार से जिलावार उद्योग स्थापित करने के कलस्टर का क्या हुआ… पूछिये केंद्र सरकार से बैंक जमा-साख अनुपात का पालन क्यों नहीं कर रहे है… कुल मिलाकर कहना है की सता पक्ष इसलिए मनमानी करने में कामयाब है क्योंकि उसे विपक्ष भी उसके अनुकूल मिला है.

 

आज बिहार विपदा के समय में भी बिखरा हुआ है.. और हमारा बिहारीपन आहत है. शायद यह महामारी से हम पार पा लेंगे..लेकिन हमारा राज्य कभी भी बिहारीपन के लिए सामूहिक शक्ति के रूप में काम नहीं कर पायेगा. इस राजनीति से उम्मीद मत रखिये, खुद से ही उम्मीद कीजिये. आज बिहार को तलाश है प्रबंधन में दक्ष लोगों की जो व्यापर कर सकें.. तरीके से सता पक्ष-विपक्ष दोनों से सवाल कर सके.. अवांछित तत्वों को अपने सिस्टम में हाशिये पर फेंक सकें.. याद रखिये, अयोग्य लोगों को सिस्टम से दूर किये बिना अपने राज्य का भला नहीं हो सकता है. इस राज्य के पक्ष-विपक्ष की नाकामियों की ढेर कहानियां है.. कहने से भी स्थिति बदलने से रही…

 

फिलहाल तो इंसान के प्रति इंसान के क्रूरता के दौर  के हम गवाह है.. दिल्ली-एनसीआर में बिहारी भी तो बड़ी संख्या में रहते है.. कुछ लोगों ने तो राहत के नाम पर योगदान दिया.. लेकिन यह भी सत्य है की हम में से अधिकांश क्रूर है. शर्म आती है दोस्त…रोना आता है!

 

साभार: यह टिपण्णी लेखक के फेसबुक वाल से लिया गया है.

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