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हकसफा वाद के तहत जमीन पर दखल-कब्जा दिलाने की प्रक्रिया पर सुझाव दे रहे हैं सुबोध कुमार

आजकल प्रायः देखा जा रहा है कि लोग सरकार के बनाए नियम/कानूनों/आदेशों का पालन नहीं कर रहे हैं। जिसके कारण विधि-व्यवस्था की समस्या खड़ी हो जा रही है। किसी भी सरकारी अधिकारी के कोर्ट से कोई आदेश निकल जाने पर भी कोई उसका पालन नहीं कर रहा।

एक उदाहरण देखिए, एक आदमी हकसफा वाद (pre-emption) DCLR के यहां फ़ाइल करता है। DCLR के यहां वह केस जीत भी जाता है। फिर भी दूसरा पक्ष जीते हुए पक्ष को जमीन पर कब्जा होने नहीं दे रहा। जीता हुआ पक्ष जमीन पर कब्जे के लिए CO से लेकर सभी राजस्व अधिकारियों के यहां दौड़ लगा के थक चुका है। कह रहा है कि जब सरकार दखल-कब्जा दिला ही नहीं सकती तो फिर ऐसा एक्ट बनाया ही क्यों??




क्या है हकसफा वाद ?
कोई व्यक्ति अपनी कृषि योग्य भूमि अपने चौहद्दीदार को न बेच कर(चौहद्दीदार के उस जमीन को खरीदने की इच्छा के बावजूद) किसी बाहरी व्यक्ति को बेचता है तो चौहद्दीदार DCLR के यहां हकसफा वाद दायर करता है कि जमीन खरीदने का उसका हक पहला है, चूंकि चौहद्दीदार होने के कारण चकबंदी के दृष्टिकोण से उसका हक पहले बनता है।
(यह अलग बात है कि चौहद्दीदार होने के बावजूद आवासीय भूमि, किसी को दानपत्र की हुई कृषि योग्य भूमि,किसी बाहरी भूमिहीन व्यक्ति के द्वारा खरीदी गई कृषि योग्य भूमि आदि आदि पर हकसफा लागू नहीं होगा। ये सब DCLR कोर्ट में निर्णय होता है।)

हकसफा के लिए चौहद्दीदार जमीन की कीमत एवं 10% अतिरिक्त राशि चालान के माध्यम से सरकार के बताए हुए शीर्ष में जमा करता है।

वजह यह कि जमीन की कीमत पहले जमीन खरीद चुके व्यक्ति को मिल जाए और 10% राशि सरकार के खाते में रहेगी। जब पहले खरीदने वाला व्यक्ति चौहद्दीदार को जमीन रजिस्ट्री कर देगा तो उसको सरकार जमीन की कीमत का पैसा लौटा देगी। अगर वह व्यक्ति न पैसा लेगा और न जमीन रजिस्ट्री करेगा तो DCLR खुद या किसी को प्राधिकृत कर जमीन की रजिस्ट्री चौहद्दीदार के पक्ष में कर देगा।

ऊपर के मामले में ऐसा रजिस्ट्री DCLR के द्वारा चौहद्दीदार के पक्ष में हो चुका है। लेकिन अभी तक उसको कब्जा जमीन पर नहीं मिला। DCLR ने कब्जा दिलाने के लिए अंचलाधिकारी को लिखा। पता नहीं, कितना समय गुजर गया, कब्जा नहीं दिलवाया गया। क्योंकि चौहद्दीदार की अपेक्षा पहला व्यक्ति दबंग है।

मजे की बात यह है कि नियम के मुताबिक केस फ़ाइल होने के साथ ही DCLR को जमीन पर कब्जा चौहद्दीदार को दिला देना था। केस फाइनल हो गया। कितने दिन बीत गए। फिर भी चौहद्दीदार को कब्जा नहीं दिलवाया गया।

चौहद्दीदार का तो पैसा भी फंस गया और कब्जा भी नहीं हुआ।वो तो दोनों तरफ से गया।

तो आखिर दखल दिलाया कैसे जाता है ?

अंग्रेज के समय में कब्जा दिलाने के लिए अधिकारी ढोल नगाड़े के साथ जाते थे और व्यक्ति विशेष को जमीन पर कब्जा घोषित करते थे। बेदख़ल हुए व्यक्ति को हिम्मत नहीं थी कि दुबारा जमीन की ओर ताके भी।

आज के समय में अधिकारी जा कर ट्रैक्टर से खेत को जुतवा देते हैं और व्यक्ति लिखता है कि कब्जा पाया। अगर कब्जा पाया व्यक्ति कमजोर है तो बेदखल हुआ आदमी फिर उसको हटाकर पुनः जमीन पर कब्जा जमा लेता है। वो कमजोर आदमी फिर दौड़ेगा अधिकारियों के पास। अधिकारी दुबारा जाना नहीं चाहते। यह कह कर कि हम तो दखल दिला ही दिए थे, अब क्या जमीन को पकड़ के बैठे रहें।

इसका समाधान क्या है?

आज की तारीख में सरकारी आदेशों को न मानने पर IPC 188 के तहत अवमानना वाद चलाकर DCLR को अभिलेख सिविल कोर्ट में भेजना होगा। यह कितनी लंबी प्रक्रिया है और इसमें कितना समय लगेगा, सबको मालूम ही है। अमूमन अधिकारी इस कागजी पचड़े में पड़ना नहीं चाहते। यह भी सच है कि बहुतों को यह पूरी प्रक्रिया मालूम भी नहीं है।

ऐसे सरकारी आदेश न मानने वाले लोगों के कारण अराजकता सी छाई हुई है। विधि-व्यवस्था कंट्रोल करना मुश्किल हो रहा है। पुलिस भी एक सीमा से ज्यादा कुछ नहीं कर पा रही। एक आदमी पर एक्शन न होने से देखा-देखी दूसरा आदमी भी गैर-कानूनी कार्यों की ओर अग्रसर हो जाता है। शुरू से ही ध्यान न देने के कारण यही समस्या आज अपने विकराल रूप में मुंह बाए खड़ी है।

तो क्या यह मान लेना चाहिए कि कमजोर/शरीफ/कानून का पालन करनेवाले सभ्य लोगों का जमीन पर कब्जा नहीं हो पाएगा और धूर्त/दबंग/कानून का पालन नहीं करनेवाला आदमी मौज करेगा?

यानि जिसकी लाठी उसकी भैंस रहेगी।
आज के इंटरनेट युग में जब सब कुछ त्वरित चाहिए तो पब्लिक को भी विवाद का हल त्वरित चाहिए। काफी देर से मिला न्याय किसी काम का नहीं।




क्या है इसका त्वरित निदान ?

बिना लाठी और गोली चलाए इसका उपाय बहुत आसान है।

जो भी व्यक्ति सरकारी आदेश/नियम/कानून का उल्लंघन करता है, उसको सभी सरकारी चीजों के उपयोग से प्रतिबंधित कर दिया जाए। जब वो सरकार की बात नहीं मानता तो सरकार उसकी चिंता क्यों करेगी?

मसलन, उसको सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था उपयोग करने से प्रतिबंधित कर दिया जाए।

उसका सरकारी हॉस्पिटल में कोई इलाज न हो। सरकार ऐसे व्यक्ति पर खर्च क्यों करेगी जो कानून का पालन नहीं करता हो। वह अपना इलाज प्राइवेट हॉस्पिटल में कराए।

उसके बच्चों को सरकारी कॉलेज में एडमिशन न दिया जाए।

किसी भी सरकारी कार्यालय में उसका प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया जाए।

किसी भी सरकारी योजना का लाभ उस व्यक्ति को न दिया जाए।अगर मिल रहा है तो समाप्त कर दिया जाए।

बिजली/पानी का कनेक्शन समाप्त कर दिया जाए,अगर है तो। आदि, जो सरकार उचित समझे।

इससे होगा यह कि विधि -व्यवस्था के लिए अनर्गल माथा-पच्ची नहीं करनी पड़ेगी। जो लोग बैंक का लोन वगैरह ले के भागा हुआ है, वो सभी भी इन प्रतिबंधों के कारण लोन लौटाने पर विवश होगा। सरकारी जमीनों पर अवैध तरीके से वर्षों से कब्जा जमाए लोगों पर ऐसे प्रतिबंध लगाना ही आज की तारीख में एकमात्र रामबाण उपाय दिखता है।
अन्यथा, सुबह का हटाया गया अतिक्रमण शाम को पुनः दिखने लगता है। आखिर एक ही काम अधिकारी कितनी बार करेगा? एक तरह से ऐसे लोगों का सम्पूर्ण सरकारी बहिष्कार होना चाहिए। तभी सुधार संभव दिखता है।
हर आदमी बिना लाठी/गोली चले ही कानून का पालन करने लगेगा।

कुछ लोगों को यह सुझाव अजीब लग सकता है। लेकिन ये अजीब है नहीं। चीन तो इसी थ्योरी पर अमल करता है। कुछ लोग इसे तानाशाही से जोड़कर देखने लगेंगे और मानवाधिकार के उल्लंघन की बात करने लगेंगे।
मानवाधिकार के मुद्दे पर मेरा कहना है कि एकपक्षीय बात कभी नहीं होनी चाहिए। मानवाधिकार उस व्यक्ति का भी तो है जो कोर्ट से जीत जाने के बावजूद भी दबंग के हाथों न जाने कब से पीड़ित हो रहा है। उसको जल्द न्याय नहीं मिल रहा है। जिसके कारण सरकारी तंत्र में जनता का विश्वास कम हो रहा है। देर होने के कारण लोग खुद ही फैसला कर लेने पर उतारू हो रहा है। जिसके कारण विधि-व्यवस्था का बिगड़ना आम बात हो गई है।




मूल बिंदु यह है कि आखिर कानून का पालन करनेवाले पक्ष (जो पीड़ित है) का भी तो मानवाधिकार है। उसपर भी तो ध्यान देना होगा। सिर्फ अराजक तत्वों के मानवाधिकार की बात करने से काम नहीं चलेगा।

किसी भी गांव में दो-चार से ज्यादा दबंग नहीं होते। उन्हीं की देखा-देखी या उन्हीं के इशारे पर अन्य लोग भी सरकारी आदेशों का पालन नहीं करते। किसी में कानून का भय नहीं रह गया है।
ऐसे लोगों को चिन्हित कर उनपर ऐसे प्रतिबंध लगाना अत्यावश्यक है। समय की मांग है ये। इसमें कोई तानाशाही वाली बात नहीं है।
क्या सरकार ऐसे लोगों पर सरकारी पैसा खर्च करेगी जो सरकार के नियम/आदेश/कानून का पालन न करता हो?
बिलकुल नहीं।

तो इस आधार पर ऐसा कानून सरकार को अविलंब बनाना चाहिए। आज के संदर्भ में आसानी के साथ विधि-व्यवस्था बनाए रखने का यही रामबाण उपाय दिखता है।

(लेखक बिहार प्रशासनिक सेवा के उप सचिव स्तर के पदाधिकारी हैं और सामाजिक और प्रशासनिक सुधारों को लेकर विमर्श में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं. उपरोक्त आलेख उनसे हुई बातचीत पर आधारित है)

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