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जमीन विवादों के मामलों पर सुबोध कुमार की त्वरित टिप्पणी

भूमि के छोटे-छोटे मामले में लोग परेशान हैं, जो राजस्व अधिकारियों के छोटे पहल से दूर हो सकते हैं। लेकिन, उनके ध्यान न देने के कारण मामला लटका हुआ रहता है।
कुछ उदाहरण- जमीन का revisional सर्वे फाइनल हुआ नहीं और अब होगा भी नहीं। लेकिन, एक दबंग ने एक कमजोर की जमीन सर्वे के अपूर्ण दस्तावेज में अपने नाम चढ़वा कर आम गली समेत उस कमजोर के घर का एक भाग घेर लिया।कमजोर आदमी गुहार लगा रहा है। सारे राजस्व अधिकारी कान में तेल डाल के बैठे हुए हैं जबकि उसमें सरकारी भूमि भी सन्निहित है।
खुलेआम जिसकी लाठी उसकी भैंस।
कितने ही लोगों का जमीन दबंग लोग यह कह कर पकड़े हुए है कि उसके(कमजोर पक्ष के) पिता/पति/पूर्वज ने जमीन का मौखिक रूप से बयाना लिया हुआ था। यानि बिना कोई लिखित बयाना के जबर्दस्ती जमीन कब्जा।
मामला उसी प्रकार का है कि
*तू नहीं तो तेरे बाप ने पानी जूठा किया होगा।*
यानि जिसकी लाठी उसकी भैंस। राजस्व अधिकारी किंकर्त्तव्यविमूढ़ हैं।
*इसका एक solution वर्त्तमान में यह दिखता है कि एकदम साफ और स्पष्ट मामले में sdm के यहां crpc 144 में जाना चाहिए और sdm 15-20 दिन के अंदर सुनवाई कर आदेश पारित कर दें सही व्यक्ति के पक्ष में और दूसरे को जमीन पर जाने से प्रतिबंधित कर दें तो डेढ़ महीने में सही आदमी कम से कम अपनी जमीन पर बाउंड्री तो करा ही सकता है। इस प्रक्रिया में कहीं कोई कानूनी अड़चन(अगर जमीन पर किसी कोर्ट का किसी प्रकार का कोई आदेश पूर्व से न हो तो) भी नहीं है। लेकिन बिंदु यह है कि sdm आम जनता के लिए इतना pain लेंगे, इसमें मुझे संदेह है।*
एक मामले में एक महिला co ने अपनी अज्ञानता का परिचय देते हुए रैयती भूमि पर भी अतिक्रमण वाद चला दिया और घर भी तोड़ने के लिए फ़ोर्स के साथ पहुंच गई। पूछने पर बोली, यह सरकारी जमीन है। लेकिन अगर सरकारी जमीन का रसीद गलत ही कटा हुआ हो तो भी जब तक उसकी जमाबंदी रद्द नहीं होती तब तक तो वो रैयती ही count होगी। बिना अपर समाहर्त्ता के यहां से जमाबंदी रद्द कराए उस पर अतिक्रमण वाद कैसे चलेगा???
एक मामले में co ने नहर की जमीन पर ही नल-जल योजना के लिए पानी की टंकी निर्माण की अनुमति दे दी है। जबकि जल स्रोत की भूमि पर किसी प्रकार का निर्माण नहीं होना है।
एक मामले में co ने एक सरकारी खाते के 3 खेसरे में से दो खेसरे को छोड़ दिया और एक खेसरा को सरकारी भूमि बताते हुए उसके निबंधन पर रोक लगाने हेतु जिला में चिट्ठी भेज दिया। जबकि उस खेसरे का 1956 से रसीद भी कट रहा था। जब RTI में co से मांगा गया तो कहा गया कि उस खेसरा का निबंधन हो सकता है। अब वह व्यक्ति निबंधन कराने जा रहा है तो sub रजिस्ट्रार उसका RTI दिखाने के बावजूद निबंधन कर ही नहीं रहा है। वह व्यक्ति हैरान-परेशान है।
एक व्यक्ति के नाम से रसीद कट रही है। लेकिन उसका घरेलू नाम रसीद पर चढ़ गया है। वह official नाम चढ़वाने के लिए affidavit भी दे रहा है, क्योंकि  जमीन पर बैंक से लोन लेने के लिए उसको रसीद पर official नाम की आवश्यकता पड़ रही है। co जांच कर खुद सुधार कर दे या जांच के साथ अपर समाहर्त्ता को फॉरवर्ड कर आदेश प्राप्त कर सुधार करवा दे। सुधार  क्या करवाएगा, उस आदमी को सही process भी co नहीं बताता। आदमी साल भर से दौड़ रहा है।
यह तो स्थिति है।
कई मामले ऐसे हैं जिसमें सीलिंग एक्ट की धारा 16(3) हकसफ़ा वाद के सरकार द्वारा समाप्त कर दिए जाने के बाद भी दूसरा पक्ष(दावाक़र्त्ता) जबर्दस्ती जमीन पर कब्जा किए हुए है।
मतलब यह कि हकसफा के मामलों में जो दबंग है वह जमीन कब्जा कर के बैठा है(फैसला चाहे उसके विरुद्ध ही क्यों न हुआ हो)। सही व्यक्ति परेशान है कि आखिर उसको जमीन पर दखल दिलाएगा कौन??
एक मामले में कमजोर द्वारा दबंग के यहां गिरवी रखी भूमि पर भी दबंग कब्जा कर मकान भी बना लिया। जबकि 7 साल बाद जमीन स्वयमेव गिरवी रखने वाले के पास बिना एक पैसा दिए लौट जानी थी। गिरवी 1950 के आस पास रखी गई थी।
जबकि DCLR ने इसे title का मुद्दा बना दिया और सिविल कोर्ट में पक्षकारों को जाने को कहा। इतने clear मामले में भी अब कमजोर पक्ष बेचारा कब तक केस लड़ेगा और क्यों ???
अधिकांश मामलों में कोई भी title का मुद्दा ही नहीं है। मामला बिलकुल साफ और स्पष्ट है कि जमीन कब्जाने वाले दबंग का कोई title बनता ही नहीं है।
बात यह कि फील्ड में अधिकारी कई कारणों से खुद को इतना कमजोर/असहाय पा रहे हैं कि वो सिर्फ नौकरी किसी तरह काट कर निकल जाना चाहते हैं। इन कारणों से कोर्ट में भी भूमि-विवादों की बाढ़ आई हुई है। सरकार को उच्च स्तर पर कोर्ट से ही वार्त्ता कर इसका हल निकालना चाहिए कि साफ और स्पष्ट रैयती मामले में (जिसमें दूर-दूर तक कोई title का मुद्दा न हो और मात्र दबंगता के आधार पर एक पक्ष ने किसी कमजोर की जमीन पर कब्जा कर रखा हो) revenue अधिकारियों को दखल दिलाने संबंधी शक्ति हो। अन्यथा, सरकार के प्रति पब्लिक का विश्वास कम होता चला जाएगा।
बिंदु यह भी है कि पब्लिक का जो काम easily हो सकता है वह भी राजस्व अधिकारियों की अल्पज्ञता या किसी अन्य गुप्त वजह(जो सबको मालूम है) के कारण नहीं हो पा रहा और पब्लिक एक-दो दिन नहीं, सालों से दौड़ लगा रहा है तो उसमें सिस्टम के प्रति अविश्वास तो आएगा ही आएगा। इसमें आश्चर्य कैसा??
एक मामला ऐसा भी संज्ञान में आया जिसमें एक मंजिल मकान बन जाने और दूसरा मंजिल निर्माणाधीन के बावजूद crpc 144 के लिए sdm के यहां आवेदन आता है और sdm के यहां उसके ग्राह्यता के बिंदु पर सुनवाई के लिए उभय पक्ष को नोटिस होता है जिसके आलोक में थाना जा के बिना 144 लागू हुए ही निर्माण कार्य रोकने को कहता है। ऐसे-ऐसे थाना के लोग भी हैं।
अब मकान बनानेवाला हैरान-परेशान हो रहा है। किसको मतलब है आम पब्लिक की परेशानियों से??
कुछ लोगों ने यह भी बताया कि camp में आए हुए mutation के आवेदन को co office द्वारा जान-बूझकर रिजेक्ट कर दिया जाता है और फिर उसी मामले को पब्लिक dclr के यहां जाकर अपील की परेशानी से बचने के लिए सिर्फ deed नंबर बदल कर अंचल कार्यालय कर्मियों से सेटिंग कर फिर से अंचल में ही उसी आवेदन की entry करवा कर mutation accept करवा लेता है। ताकि dclr के यहां appeal में जाने का झंझट न रहे। यानि पहली बार में वही mutation reject, दूसरी बार में setting से वही mutation accept.
कुछ ने यह भी बताया कि एक ही तरह के मामले में *A* का mutation reject कर दिया जाता है और *B* का accept.
सब सेटिंग का खेल है।
अगर ऐसा किया जा रहा है तो इसकी व्यापक छान-बीन कर वैसे अंचल के वैसे सभी कर्मियों को बर्खास्त कर देने की आवश्यकता है जो इस तरह के निकृष्ट कार्य में संलग्न हैं।
*हम सभी लोग(यहां तक कि पूरा तंत्र विधायिका/कार्यपालिका/न्यायपालिका) पब्लिक के काम को आसान बनाने के लिए हैं न कि उनका काम मुश्किल करने के लिए। क्योंकि संविधान लोक-कल्याणकारी राज्य की बात करता है। आम जनता को त्वरित न्याय दिलाना भी समूचे तंत्र का संवैधानिक दायित्व है। अगर हम ऐसा नहीं कर पाते तो हमारे रहने का औचित्य ही क्या है?
(लेखक बिहार प्रशासनिक सेवा के उप सचिव स्तर के पदाधिकारी हैं और सामाजिक और प्रशासनिक सुधारों को लेकर विमर्श में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं. उपरोक्त आलेख उनसे हुई बातचीत पर आधारित है)

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