वीर कुंवर सिंह जयंती पर कबड्डी चैम्पियनशिप का आयोजन
April 25, 2019
बिहार में इन लोकसभा क्षेत्रों के नतीजों के साथ खुलेंगे नये राजनीतिक संभावनाओं के द्वार !
May 20, 2019

सरकारी जमीन को हथियाने में संपन्न लोगों का साथ दे रहे अफसरों और कर्मियों की कहानी

सुबोध कुमार

सरकार ने लोक-कल्याण के मद्देनजर जमीन की बंदोबस्ती का प्रावधान असहाय, बेघर और लाचार भूमिहीन लोगों के लिए किया था ताकि उन्हें राहत दिया जा सके।
लेकिन इसका जम कर दुरुपयोग हुआ। जिसको जहां सरकारी जमीन मिला, उसपर कब्जा कर लिया और येन-केन-प्रकारेण उस सरकारी भूमि का बंदोबस्ती अपने पक्ष में कराने का प्रयास करता रहा। तथाकथित तेज-तर्रार कहलाने वाले बहुत सारे लोग इसमें अधिकारियों/कर्मचारियों की नजरे-इनायत से सफल भी हो गए।

जैसे, कई जगहों पर तालाब की भी बंदोबस्ती हो गई। महाराजगंज(सिवान) के दरौंदा अंचल अंतर्गत एक गांव में एक तालाब गैरमजरूआ आम जमीन था। उसकी न जाने कब और कैसे बंदोबस्ती हो गई??

पहली बात तो यह कि किस्म गैरमजरूआ आम जमीन (चाहे तालाब हो या कुछ और) की बंदोबस्ती हो ही नहीं सकती। यहां तक कि 1 जनवरी, 1946 के पूर्व भी जमींदार द्वारा गैरमजरूआ आम जमीन की बंदोबस्ती किसी को नहीं की जा सकती थी।

दूसरे यह तालाब गांव के बीच में था जिसमें पूरे गांव का पानी गिरता था।

तीसरे गैरमजरूआ आम जमीन की बंदोबस्ती के लिए ग्राम पंचायत की अनुमति चाहिए।

चौथे गैरमजरूआ आम जमीन की बंदोबस्ती महादलित वर्ग को छोड़कर अन्य वर्गों के लोगों को सामान्यतया हो नहीं सकती, क्योंकि उसके लिए ग्राम पंचायत की अनुमति के बाद सरकार की भी अनुमति चाहिए होता है।

अब एक व्यक्ति रसीद भी दिखा रहा था कि उसकी बंदोबस्ती हो चुकी है। वो व्यक्ति महादलित वर्ग से भी नहीं था। मेरे पास वहां DCLR रहते यह मामला आया तो 9 पेज के आदेश में विस्तार से मैंने उसका दावा खारिज करते हुए CO को आदेश दिया कि तालाब बंदोबस्ती के रद्दीकरण संबंधी अभिलेख भेजें।
आदेश की प्रति तत्कालीन अपर समाहर्ता और जिला पदाधिकारी को भी भेजी गई थी।

अब खेल देखिए।

CO ने रद्दीकरण अभिलेख भेजने में जान-बूझकर टाल-मटोल किया ताकि बन्दोबस्तधारी ऊपरी अदालत में जा सके। खैर, माननीय अदालत का फैसला आया कि बंदोबस्ती रद्दीकरण तो अभी तक हुआ नहीं, तालाब की नापी करवा दी जाए।
नापी करवाने के लिए SDM द्वारा फ़ोर्स और मजिस्ट्रेट की बहाली की गई। नापी में गांव वालों द्वारा नापी टीम पर जम कर पथराव किया गया। टीम बिना नापी किए चली आई। गांव वालों का कहना था कि तालाब सार्वजनिक है। पूरे गांव का पानी उसी में गिरता है। वो किसी व्यक्ति-विशेष का कैसे हो सकता है??गांव का पानी कहाँ गिरेगा??

बन्दोबस्तधारी व्यक्ति CO का बड़ा नजदीकी बना हुआ था। आदेश के बावजूद समय पर बंदोबस्ती रद्दीकरण अभिलेख न भेज कर CO ने एक बड़े लॉ एंड ऑर्डर प्रॉब्लम को जन्म दे दिया था। मेरा उसके बाद जल्द ही वहां से ट्रांसफर हो गया था। अभी क्या स्थिति है, मालूम नहीं है।

लखीसराय में काम कर चुके एक पदाधिकारी का कहना था कि लखीसराय के शहरी क्षेत्र में भी तालाब बंदोबस्ती कर दी गई है। ये तो और भी गजब का उदाहरण है क्योंकि शहरी क्षेत्र में तो जमीन की बंदोबस्ती वैसे ही प्रतिबंधित है। तालाब की बंदोबस्ती और वो भी शहर में। बहुत बड़ा जिगर चाहिए ऐसा करने के लिए।

ऐसे कई तालाब/पोखर पूरे राज्य में गलत तरीके से बंदोबस्त किए गए होंगे। न का सवाल ही नहीं है।

अधिकारियों/कर्मचारियों के निहित स्वार्थों ने ऐसे कई लॉ एंड ऑर्डर प्रॉब्लम को जन्म दिया है जो अब लाइलाज हो चुके हैं।

कई बन्दोबस्तधारी ऐसे हैं जो अच्छे खाते-पीते घर के हैं। गांव में आलीशान पक्का मकान भी है। लेकिन घर के आगे की गैरमजरूआ जमीन, जो आहर/पईन/नाला के रूप में थी, उसको भर कर कब्जा कर लिया और उस पर बाकायदा निर्माण भी कर लिया। बहुत लोग तो ऐसे कब्जाए सरकारी जमीन का आपसी बँटवारानामे में किसी परिजन के हिस्से में भी दिखा देता है। कलियुग के तथाकथित कुछ होशियार लोग ऐसे जमीनों के बंदोबस्त कराने के पीछे लग कर येन-केन-प्रकारेण बंदोबस्त कराने में सफल भी रहे।
अब इससे प्रॉब्लम यह हुआ कि आज की तारीख में घरों से पानी निकलने का मार्ग ही बंद हो गया है। सब लोग इधर-उधर पानी गिराता है। लड़ाई-झगड़े हो रहे हैं। बरसात का पानी जमा रहने का जगह ही खत्म हो चुका है। नतीजा ग्राउंड वाटर रिचार्ज खत्म हो रहा है। भूगर्भ जल का स्तर तो नीचे भागेगा ही।
आहर/पईन/नाला की जमीन पर कब्जा जमाए लोग आपको सभी जगह मिल जाएंगे। क्या गांव, क्या शहर। जिसके जमीन के आगे वो पड़ा, उसने आंख मूंद कर उसको रास्ते के लिए भर दिया।
लेकिन बिना भरे भी उस जमीन के ऊपर से रास्ता निकल सकता था। ढलाई कर या बांस/लोहे की चचरी बनाकर।
जमीन को भर देने का अधिकार किसी को भी कहाँ से प्राप्त हुआ??
लेकिन देखा-देखी ऐसा होता रहा। निहित स्वार्थ/स्थानीय दबाव के कारण अधिकारी/कर्मी भी चुप रहे। नतीजा सामने है।

जिनको जमीन गलत तरीके से बंदोबस्त हो गया (जो पहले और आज की तारीख में भी संपन्न हैं), उनकी बंदोबस्ती को सरकार को अभियान चलाकर रद्द कर देना चाहिए। क्योंकि बंदोबस्ती तो कभी भी संपन्न लोगों के लिए थी ही नहीं। फिर बंदोबस्ती क्यों??
कई संपन्न लोग तो श्मशान/पहाड़ की भी भूमि बंदोबस्त करवा चुका है। आज की तारीख में चूंकि जमीनों की कीमत काफी बढ़ चुकी है तो ऐसे ही जमीनों को बेच कर पहले से संपन्न ये लोग और भी संपन्न बनते जा रहे हैं। और कुछ तो राजनीति में भी हाथ आजमा रहे हैं। क्यों न आजमाए?? उसका अपनी मेहनत से कमाया पैसा थोड़े ही उड़ रहा है!!!

ऐसे संपन्न लोगों द्वारा गलत तरीके से हथियाए सरकारी भूमि पर कब्जे को लेकर प्रायः बवाल होते रहता है। तथाकथित गरीबों की पार्टी के नेतागण के उकसावे पर ऐसी जमीनों पर लाल झंडा गाड़ने/उखाड़ने का खेल खूब चलता है। नतीजा प्रशासन के लिए एक भयंकर लॉ एंड ऑर्डर प्रॉब्लम।

भूतपूर्व सैनिकों के लिए भी जमीन बंदोबस्ती का जो प्रावधान है, उसे भी आज की तारीख में समीक्षा करने की जरूरत है। सरकारी जमीन अब बची ही कहाँ है जो किसी को एकड़ के हिसाब से बंदोबस्त की जा सके? सरकार को तो खुद सरकारी काम के लिए जमीन नहीं मिल रही। भू-अर्जन करना पड़ रहा है। भू-अर्जन का पैसा वैसे संपन्न लोगों को भी मिलेगा ही मिलेगा जिनको खुद अधिकारी/कर्मी ने संपन्न रहने के बाद भी कभी वही भूमि बन्दोबस्त की थी। यानि सरकार अपनी ही भूमि को पैसा देकर पुनः खरीदती है। गज़ब। ऐसे संपन्न लोगों को बंदोबस्त की गई भूमि को अभियान चलाकर बंदोबस्ती रद्द कर देने की जरूरत है। इसके लिए सरकार ने बिहार भूमि दाखिल-खारिज अधिनियम, 2011 में अपर समाहर्ता को जमाबंदी रद्द करने संबंधी शक्ति भी दे रखी है।

कुछ लोगों ने बंदोबस्त की गई भूमि की खरीद-बिक्री भी कर दी। जबकि बन्दोबस्त भूमि हस्तांतरणीय नहीं है। इसकी खरीद-बिक्री नहीं की जा सकती। क्यों??
क्योंकि बन्दोबस्तधारी जमीन बेचकर पैसा कमाएगा, खर्च कर देगा, बेघर हो जाने का रोना रोते हुए फिर कहीं सरकारी जमीन पर बसेगा।  ऐसे तो सरकार एक ही व्यक्ति को जमीन बंदोबस्त करते ही रह जाएगी। इस प्रकार की सारी बिकी हुई जमीनों को सरकार द्वारा पुनःगृहीत कर लेना चाहिए। तभी इस पर रोक लग पाएगी। ऐसा प्रावधान भी है।

कुछ राजस्व सेवा से जुड़े कर्मी भी नौकरी करने के दरमियान अपने गाँव में सरकारी जमीन बंदोबस्त करा लिए। घनघोर आश्चर्य। सरकारी नौकरी वाले को जमीन बंदोबस्त कैसे हुई?? ऐसी बंदोबस्ती भी रद्द कर इन सबके लिए जिम्मेदार तत्वों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

1 जनवरी, 1946 से पहले का (गैरमजरूआ खास जमीन की बंदोबस्ती के संदर्भ में) जमींदार का बंदोबस्ती पट्टा मान्य है। लेकिन इसका दुरुपयोग देखिए कि आज तक लोग पट्टा न जाने कहाँ-कहाँ से फर्जीवाड़ा कर ला रहा है। फर्जीवाड़े का आलम ये है कि कागज को एक खास तेल में डुबा कर रखा जाता है। जिससे कागज बहुत पुराना दिखने लगता है। फिर कुछ पुराने कैथी जाननेवाले लोगों से उस कागज पर फर्जी तरीके से कुछ भी अपने मनोनुकूल लिखवा कर CO के सामने पेश कर दिया जाता है और उस जमीन को अपना बताते हुए लगान निर्धारण करने की मांग की जाती है।
इस प्रकार यह खेल अभी भी पूरे बिहार में जारी है। सरकार को ऐसे पट्टों के माध्यम से जमीन के बड़े-बड़े रकबे के हुए लगान निर्धारण की अवश्य जांच करवानी चाहिए। यही सफेदपोश माफिया लोग आज इन्हीं महंगी हो चुकी सरकारी जमीनों की बदौलत बड़ी-बड़ी चमचमाती गाड़ियों में फर्राटा भरता है और राजनीतिक रसूख भी प्राप्त करना चाहता है। हराम के पैसे के बल पर ऐसे लोग विधि-व्यवस्था खराब करने के लिए भी उत्तरदायी हैं, जो सरकार के लिए एक अलग ही चिंता का विषय है।

इन सभी फर्जी बंदोबस्ती/लगान निर्धारण को रद्द करते हुए सरकार को सारी जमीन पुनःगृहीत कर लेनी चाहिए। बहुत मुश्किल काम नहीं है ये।

(लेखक बिहार प्रशासनिक सेवा के उप सचिव स्तर के पदाधिकारी हैं और सामाजिक और प्रशासनिक सुधारों को लेकर विमर्श में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं. उपरोक्त आलेख उनसे हुई बातचीत पर आधारित है)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *