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‘’मध्यकालीन भारतीय जीवन शैली एवं परिस्थितियाँ’’(1200-1550)

रामजी चौधरी, शोध छात्र, वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा

शोध विषय का महत्त्व:- प्राचीन, मध्य और आधुनिक काल के रूप में भारतीय इतिहास के काल विभाजन पर लोग एकमत नहीं है । कुछ विद्वान भारतीय इतिहास का मध्यकाल 1526 ई. के पानीपत के युद्ध के साथ समाप्त हुआ मानते है । यही मतभेद प्राचीन काल के सीमा निर्धारण के समय में दिखलाई देता है । मुस्लिम शासन के अन्तर्गत हम भारतीय इतिहास के किसी नये दौर में नहीं, बल्कि महान सामाजिक विकास की एक ऐसी अवस्था में प्रवेश करते हैं जो भारतीय इतिहास के उदय काल से ही प्रवाहमान रही है और जो अभी भी अधुरी है या अपूर्ण है । तथापि यह इस काल के महत्त्व को या भारतीय संस्कृति की संपदा में से एक है । यह केवल एक विचित्र संयोग या कि जिस पहली शक्ति के साथ हिन्दुओं का स्थायी सम्पर्क हुआ, वह एक ऐसी शक्ति थी जो केवल उससे नितांत भिन्न थी, बल्कि उनकी सम्पूर्ण व्यवस्था की प्रतिवाद थी । मुस्लिम प्रभाव के परिणामस्वरूप प्राचीन हिन्दू-समाज विभाजन प्राय: मटियामेट हो गया था । राजनीतिक और सामाजिक विभेदों की खाई पाती गई । मुस्लिम संस्कृति को अपनाने में हिन्दुओं को कोई ख़ास आपत्ति नहीं हुई । धर्म एवं विश्वास में भले ही कोई विशेष अंतर दृष्टिगत नहीं हुआ हो, किन्तु सामाजिक व्यवस्था के मूल-भूत ढाँचें हिल गये । वर्णभेद शिथिल हुआ और धार्मिक प्रवृतियों में एक नवीन मोड़ और शक्ति आई और अंत में एक समय भारत की अवधारणा संभव की जा सकी । इन विकासों के प्रकाश में ही मुस्लिम शासन बहुत अपूर्ण रूप से सही बोधगम्य होने लगा प्रारम्भिक मुस्लिम काल का अध्ययन इसलिए विशेष महत्वपूर्ण हो जाता है कि भारतीय संस्कृति की ये निर्माणकारी शक्तियाँ उस समय ही सक्रिय हुई । यद्दपि उनका स्वरुप बहुत कुछ अनपढ़ और अपूर्ण था तो भी वे ऐसी आधारशिला रखने में समर्थ हुई जो पूर्ववर्ती मुगलों के लिए वैभवशाली इमारतों के निर्माण में शक्तिदायक सिद्ध हुई । अकबर के समय तक इसका बुनियादी स्वरूप पूर्ण हो चूका था और सम्राट अकबर तथा उसके उतराधिकारियों ने अपने पूर्ववर्ती अफगान तथा तुर्की शासकों द्वारा ढाले हुए सांचों का अनुकरण किया । भारतीय समाज को मुगलों का देन का सही आकलन करने के लिए इस काल का महत्वपूर्ण स्थान है ।

प्रस्तावित शोध- प्रबन्ध की प्रकृति और उनके मूल्यांकन के संबंध में इसे स्वीकार किया जा सकता है कि पश्चिम के औधोगिक क्रांति के पश्चात पश्चिम के निवासियों का जीवन काफी समृद्ध हो गया था । दूसरी और भारत के निवासियों का जीवन अभी भी काफी अंश तक मध्यकालीन यूरोपीय जीवन के समान था । इससे कुछ लोगों का यह विश्वास बन गया कि चूंकि भारत के निवासियों में कोई विकास-भावना दृष्टिगोचर नहीं होती । इसलिए उसका कोई इतिहास नहीं है । वस्तुतः वे कल, आज और सदैव एक से ज्यों का त्यों हैं, जबकि पश्चिम दुनिया मध्यकालीन भारत की तुलना में आधुनिकता की गति को तीव्र कर रहीं थी ।

इस निष्कर्ष का कारण यह भी है कि बहुधा भारतीय वृतांतों और इतिहास ग्रंथों में केवल राजाओं और युद्धों का ही वर्णन किया गया है ।

यह कहना कि पूर्व के लोग पश्चिम के लोगों की तुलना में परिवर्तनशील नहीं है किसी सीमा तक ही सत्य कहा जा सकता है । यह नहीं भूल जाना चाहिए कि औद्दोगिक समाज की तुलना में कृषि प्रधान सभ्यता का विकास क्रम अनिवार्यत: धीमा होता है । कृषि-प्रधान सभ्यता की विकास शताब्दियों तक फैला रहता है और यद्दपि उसकी उन्नति ऊपरी दृष्टि से नहीं दिखलाई पड़ती ।

वह अनिश्चित कभी नहीं कही जा सकती । वह नवीन शक्तियों के प्रभाव से अधिक गतिमान होती जाती है । जब सभ्यता परिपक्वता प्राप्त कर लेती है तो सामाजिक ढाँचें के भीतर उसके विकास की संभावनाएँ भी अवरुद्ध हो जाती है और तब सभ्याताएं या तो जड़ को जाती है, उसका पतन होने लगता है, अथवा वह उन्नति के लिए नये दौर में प्रवेश करती है । किन्तु उस समय तक वह तत्कालीन सामाजिक ढ़ांचें के भीतर समस्त संभाव्य विकास परिपूर्ण कर लेती है और हर हालत में ऐसे लोगों को एक उन्नत सांस्कृतिक चरण की और ले जाती है ।

यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि ‘सुल्तान’ की पदवी कैसे और कब उद्भूत हुई । सर्वप्रथम यह उन शासकों द्वारा प्रयुक्त की गई, जो बगदाद के खलीफा के भूतपूर्व प्रान्तों में स्वतंत्र राजा के रूप में प्रतिष्ठित हो गए थे । ‘सुल्तान’ और ‘सल्तनत’ शब्द एक ही धातु से लिए गये हैं जिसका अर्थ ‘शक्ति’ ‘अधिकार’ होता है और ये सामान्यत: राज्य के उस रूप के लिए प्रयुक्त किये जाते हैं जो मुहम्मद के प्रथम चार उतराधिकारियों के पश्चात् इस्लामी जगत में अस्तित्व में आया, किन्तु मूलतः जिसका विचार कुरान में नहीं किया गया था । दिल्ली के सुल्तानों के समय प्रचलित प्रभुसत्ता के सिद्धांत का अध्ययन अत्यंत रोचक है क्योंकि वह ण केवल मुस्लिमों के राजनैतिक आदर्शों पर बल्कि एक विस्तृत अर्थ में जीवन के प्रति उनके समस्त दृष्टिकोण पर भी प्रकाश डालता है । कुरान में विहित सैद्धांतिक ‘खिलाफत’ से इस्लामी सुल्तानों के निरंकुश शासन तक यह महान परिवर्तन कैसे हुआ, इसे लिए कहा जा सकता है कि मुसलमानों के समक्ष राजतंत्र और अराजकतावाद में से एक को चुनने का प्रश्न उपस्थित हुआ और उन्होंने बुद्धिमतापूर्वक पहले को चुना । इसी समय ‘उलमा’ या मुस्लिम अर्थशास्त्र के विद्वान जो मदीना तक ही सीमित थे, इस्लामी कानून की एक ऐसी प्रणाली का विस्तार कर रहे थे, जिसका इस्लामी राज्य की परिस्थितियाँ से बहुत काम सम्पर्क था । मुस्लिम रुढ़िवादियों के केंद्र मदीना और अरब साम्राज्य की राजधानी दमिश्क के मध्य इस सद्भावना का भंग हो जाना प्रकट करता है कि क्यों प्रारंभ से ही मुस्लिम कानूनों की प्रकृति विशुद्ध सैद्धांतिक हो गई और वे इतने अधिक सिद्धांतों का उल्लेख करने लगे जो कदाचित् ही कभी व्यवहार में लाये गये हैं । दूसरी बात यह कि खलीफाओं के बाद भी इस्लामी इतनी प्रगति करते गया कि ‘खलीफा’ शब्द के जगह सुल्तान शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा क्योंकि सुल्तान खलीफा भी माना जाने लगा ।

(लेखक वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के शोधार्थी है एवं मध्यकालीन भारत इतिहास को लेकर अध्ययनरत है)

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