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कैसे भूमि विवादों को रोका जा सकता है, बता रहे है बिहार प्रशासनिक सेवा के अधिकारी सुबोध कुमार

बिहार प्रशासनिक सेवा के अधिकारी श्री सुबोध कुमार वर्तमान में राजस्व विभाग में उप सचिव स्तर के पदाधिकारी  है. श्री कुमार की पहचान प्रशासनिक सेवाओं से अलग सामाजिक सुधारों को लेकर मौलिक चिंतन के कारण भी है. श्री सुबोध कुमार चर्चा में तब आये थे जब बिहार सरकार ने पारिवारिक जमीन की बंटवारा रजिस्ट्री शुल्क मुफ्त करने की घोषणा की थी. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लोक संवाद कार्यक्रम में यह आइडिया सुबोध कुमार ने ही दिया था. चूंकि बिहार में अधिकतर विवाद जमीन को लेकर होते रहे है. इसलिए हमने एक्सपर्ट के तौर पर श्री सुबोध कुमार से ही मिल कर जाना है कि कैसे इन विवादों को कम किया जा सकता है.

श्री कुमार कहते है कि इन विवादों के जड़ को समाप्त कर दिया जाना चाहिए. मसलन शहरी क्षेत्र की व्यावसायिक/आवासीय भूमि को घेराबंदी कराने के उपरांत ही विक्रय करना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए ताकि शहरी क्षेत्र की काफी कीमती जमीन खरीदने के बाद खरीददार चौहद्दीदारों के साथ किसी नापी विवाद में न उलझे। घेराबंदी एक-दो ईंट की ऊंचाई का ही क्यों न हो,लेकिन हो जरूर या कम-से-कम जमीन के हर कोने पर पक्का खंभा विक्रय के पूर्व जरूर गड़ा हो। इससे यह भी फायदा होगा कि घेराबंदी करने के दौरान ही जमीन से जुड़ा कोई विवाद होगा तो सतह पर जरूर आ जाएगा जिससे खरीददार को जमीन खरीदने के पूर्व ही जमीन से जुड़े विवाद का पता चल जाएगा और उसका हित सुरक्षित रहेगा। अगर शहरी के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्र की व्यावसायिक/आवासीय भूमि को भी विक्रय के पहले घेराबंदी कराना अनिवार्य कर दिया जाए तो और भी अच्छा रहेगा। क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में भी व्यावसायिक/आवासीय जमीन की कीमत काफी बढ़ गई है। यह इसलिए भी जरुरी है क्योंकि सरकार के पास नापी -विवाद होने पर उसे सुलझाने हेतु पर्याप्त संख्या में अमीन भी नहीं है।

कभी अरविन्द केजरीवाल को प्रदूषण नियंत्रण  पर सुझाव देने वाले श्री सुबोध कुमार कहते है कि  लगान रसीद में खाता,खेसरा और चौहद्दी का कॉलम हो। ये इसलिए जरूरी है क्योंकि बिना खाता, खेसरा और चौहद्दी के किसी भी जमीन की पहचान करना संभव ही नहीं है। वे सवालिया लहजे में कहते है कि वर्तमान लगान रसीद देखकर किसी को भी पता नहीं चलता कि आखिर वो किस जमीन का लगान दे रहा है? न्यायालय में भी वर्तमान रसीद प्रस्तुत करने पर पता ही नहीं चलता कि किस जमीन का रसीद है?  दोनों पक्ष वादग्रस्त भूमि का रसीद प्रस्तुत कर देता है। वर्तमान रसीद में खाता,खेसरा और चौहद्दी अंकित न रहने के कारण पता ही नहीं चलता कि वादग्रस्त भूमि का रसीद वाकई किस पक्ष का सही है. रसीद में खाता,खेसरा और चौहद्दी अंकित करके अगर इस डाटा को अंचलवार संधारित कर लिया जाए तो खेसरा पंजी बन जाएगी जो ऑनलाइन म्यूटेशन में भी काम आएगी और सर्वे में भी। हालाँकि होना तो यह भी चाहिए कि हर खेसरे की अलग-अलग रसीद कटे।

जमीन से जुड़े विवादों को पूरी तरह से कम से कम करने की हिमायती श्री सुबोध कुमार यहीं नहीं रुकते है. वे  निबंधन कार्यालय में दस्तावेज की रजिस्ट्री के समय अद्यतन लगान रसीद प्रस्तुत करना अनिवार्य कर दिया जाने की वकालत करते है। ऐसा करने में कहीं कोई क़ानूनी अड़चन भी नहीं है। कुछ लोगों का कहना है कि सब-रजिस्ट्रार को TITLE देखने का अधिकार  नहीं है तो लगान रसीद कैसे मांगी जा सकती है? इसके जवाब में वे कहते है कि यह सोच बिलकुल गलत है। जब लगान रसीद TITLE का सूचक नहीं होता है तो इसे मांगने में क्या दिक्कत है? आखिर झारखण्ड में रजिस्ट्री के पूर्व दस्तावेज के साथ  खतियान या LPC या शुद्धि-पत्र की कॉपी क्यों और कैसे मांगी जा रही है?  दरअसल,इंडियन रजिस्ट्रेशन एक्ट,1908 की धारा 22A कहती है कि सब-रजिस्ट्रार किसी भी दस्तावेज की रजिस्ट्री रोक सकता है अगर वो लोक नीति के विरुद्ध हो तो लोक नीति क्या कहती है कि किसी व्यक्ति की जमीन को कोई दूसरा व्यक्ति बेच दे? बिलकुल नहीं। यहाँ भी यह लागू होना चाहिए ताकि किसी की जमीन को कोई दूसरा न बेच सके। झारखण्ड में इसी धारा 22A के अनुसार ऐसा किया जा चुका है तो बिहार में रजिस्ट्री दस्तावेज के साथ लगान रसीद क्यों नहीं माँगा जा सकता है?

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