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बिहार के विकास पर एक प्रोफेसर का चिंतन, बिहारियों के छोटे प्रयास बड़े बदलाव ला सकते है

कोरोना संक्रमण के दौरान बिहारियों की घर वापसी अब बिहारियों के लिए सकारात्मक बहस का विषय बन रहा है. लोग सोशल मीडिया पर बिहार के विकास और संभावनाओं पर विचार व्यक्त कर रहे है. आज की कड़ी में हम प्रोफ़ेसर बी. के. दास. कुशवाहा के विचार अपने पाठकों के लिए दे ज्यों का त्यों दे रहे है. एनआईटी, पटना के Head, Dept. of Arch. प्रोफ़ेसर बी. के. दास का बिहार के विकास को लेकर विजन कुछ यूँ है.

Blue Print for Bihar -1

अपने आप को सीएम का उम्मीदवार घोषित करने वाले एक अर्थशास्त्री ने अपने ब्लॉग में लिखा – ‘हम कृषि क्षेत्र में 5 गुना उत्पादन बढ़ाकर अपने SGDP (बिहार) को 5 गुना बढ़ा सकते हैं। SGDP में हमारे कृषि क्षेत्र का योगदान महज 20% है। हमारे इस कृषि क्षेत्र को (यानी करीब एक लाख 30 हजार करोड़)इसे 5 गुना बढ़ाते हैं तो यह 6.5 लाख करोड़ आता है। मल्टीप्लायर इफेक्ट को ध्यान दें तो भी यह 30 लाख करोड़ का SGDP ला पाना आज के प्राइस पर अगले 5 वर्षों में असंभव है। एक rough estimation के अनुसार अगर भारत का विकास दर 5% और बिहार का 10% मान के चले तो भी बिहार का प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत तक पहुंचने में 25 साल और लगेंगे.

 

कहां जाता है बिहार का पैसा ?

बैंकों में बिहारियों का 3.5 लाख करोड़ जमा है, या तो सेविंग्स अकाउंट में या फिर फिक्स डिपॉजिट में । बैंकों का अगर C/D ratio देखें तो बिहार का महज 40% है, इसका मतलब बैंक से 1.4 लाख करोड़ कर्ज के रूप में बिहारी लोगों को देती है । यह कर्ज या तो खेत के लिए, पढ़ाई के लिए, उद्योग- धंधा लगाने , घर- गाड़ी -मकान खरीदने के लिए दिया जाता है।बाकी का 1.05 लाख करोड़ दूसरे राज्य में चला जाता है । अगर गुजरात का C/D ratio देखें तो यह 76.7% है । 30 प्रतिशत पैसा, बैंक आरबीआई में रखती है। हम में काबिलियत की कमी है और रिस्क लेने में विश्वास नहीं रखते तो उद्योग धंधा कहां से लगेगा। मालिया और चौकसी हैं नहीं कि अपना सारा ऋण write-off करवा ले और उड़नछू हो जाएं।

FD से हो रही कमाई से हम संतुष्ट हैं। पैसा होने पर जमीन जायदाद खरीदते हैं । किसान अपनी जमीन बेच बच्चों को इंजीनियरिंग पढ़ाने के लिए बाहर भेज रहे हैं । बिहार का पैसा महाराष्ट्र और तमिलनाडु जा रहा है । बड़े बाबू एक से दो करोड़ देकर बच्चों को डॉक्टर बना रहे हैं।

एफएमसीजी में हमारा योगदान जीरो है। किराना दुकान में थोड़ा बहुत बिहारी प्रोडक्ट मिल भी जाए, अगर शॉपिंग मॉल में आप देखिएगा तो बिहार का कोई सामान ना मिलेगा। अगर मिले भी तो श्री कमल का सत्तू और पूजा का आटा ।

मोटी कमाई वाले बाबू एनसीआर में फ्लैट खरीदने में लगे हुए हैं । सब का बच्चा बेंगलुरु -हैदराबाद में है । सबको फ्लैट के लिए डेढ़ से दो करोड़ चाहिए । सब पैसा लिक हो रहा है तो बिहार में संपन्नता कहां से आएगी।

सरकार सब कुछ उपलब्ध नहीं करा सकती लोगों को आगे आना पड़ेगा । विशेष राज्य का दर्जा और स्पेशल पैकेज सब हवा-हवाई हो गया।

आइए हम सब लोकल को वोकल बनाएं। ITC का आशीर्वाद छोड़िए और चक्की का आटा खाइए, 7-star बासमती छोड़िए, और लोकल उत्पादित मंसूरी चावल खाइए… लोकल उत्पादित हरा साग- सब्जी, फल- फूल- पौधा खाइए… कीवी और ड्रैगन फ्रूट को देखकर ही संतुष्टि कर लीजिए

 

हम बिहार के लिए क्या कर सकते हैं -3

आज से 20- 25 साल पहले हमारे नाना जी के गांव (हरचंडी, बांका, बिहार) से एक कामगार रोजगार की तलाश में पलायन कर बिहार से गुजरात जाता है । वहां जाकर लोहे की पाइप बनाने वाली एक फैक्ट्री में काम करता है। मेहनत के बल पर कुछ पैसे इकट्ठा करता , और काम करने की कला सीखता । कारीगरी का हुनर, व कुछ करने की जज्बा उसे वापस अपने गांव की ओर खींच लाती है।

बदाड़ी पोखर के बगल में वह एक ढलवा लोहे का चापाकल का बॉडी बनाने का कारखाना लगाता है। लल मटिया से कोयला मंगवाता है, और लौह खनिज भी बगल के खदान से आता और एक भट्टी लगाकर ढलवा लोहे का चापाकल बनाता।

जीवन में कुछ करने की इच्छा,कठिन मेहनत व कुशल प्रबंधन आज उनके फैक्ट्री को उस इलाके की शान बनाए हुए हैं । करोड़ों का सालाना टर्नओवर, एक साथ 200 मजदूर फैक्ट्री में रोज काम करते हैं । आप अंदाजा लगा सकते हैं कि बिना किसी सरकारी अनुदान के वह आज समाज को, राज्य को और देश को तरक्की में कितना योगदान दे रहे हैं।

 

आज के दिन आप कितना कमाते हैं यह मायने नहीं रखता । आप कितनों को रोजगार दिए हुए हैं -यही सच्चा धर्म होगा और एक सच्चे बिहारी का कर्तव्य रहना चाहिए। अपने धन को revolve कराइए, रोजगार के नए अवसर सृजित करिए। सरकार अपना हाथ खड़ा कर चुका है। हमारे और आपके छोटे प्रयास से ही बदलाव आएगा । आइए हम उद्यमी बने । छोटा ही सही, शुरुआत तो करें। स्वयं सहायता ग्रुप पापड़ और अचार बना सकती है तो आप उससे ऊपर तो जरूर सोच सकते हैं।

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